छोड़ आया वे पुराने मित्र, तुम निश्चिंत रहना…

संस्मरण

स्मृति शेषः आखिरकार चंदन वन में खो गये कवि किशन सरोज
लंबी बीमारी के बाद बरेली में प्रेमगीतों के कवि का महा प्रयाण
82वें जन्मदिन से 11 दिन पहले चहेतों को कहा- अलविदा
अमित अवस्थी।
कर दिए लो आज गंगा में प्रवाहित
सब तुम्हारे पत्र, सारे चित्र, तुम निश्चिन्त रहना
दूर हूँ तुमसे न अब बातें उठें
मैं स्वयं रंगीन दर्पण तोड़ आया
वह नगर, वे राजपथ, वे चौक-गलियां
हाथ अंतिम बार सबको जोड़ आया
थे हमारे प्यार से जो-जो सुपरिचित
छोड़ आया वे पुराने मित्र, तुम निश्चिंत रहना
जी यह पंक्तियां कवि किशन सरोज जी की ही हैं और उनकी लेखनी की चिरस्थायी स्मृति भी। प्रेम के महाकवि सरोज ने बुधवार (आठ जनवरी 20) दोपहर अंतिम सांस ली। वे काफी समय से अस्वस्थ थे। बेटे को खोने के बाद से लगातार अस्वस्थ चल रहे किशन सरोज जी लोगों को पहचान भी नहीं पा रहे थे। सरोज जी नहीं रहे यह अप्रिय समाचार कवियत्री सिया सचदेवा से दोपहर में मिला। जब मैंने उन्हें यूं ही फोन किया। उनकी गमगीन आवाज का कारण पूछा। जिसके जवाब में उन्होंने बरेली का नाम अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ऊंचा करने वाले महाकवि के महाप्रयाण की जानकारी दी। जेहन में किशन सरोज जी से हुई कई मुलाकातें उभर आईं। दैनिक जागरण के लिए कई मसलों पर उनसे हुई बात, उनसे की गई भेंटवार्ताएं जीवंत हो गईं।
मुझे बखूबी अब तक याद है जब जागरण के अभियान ‘चलो आज कल बनाते हैं’ के एक कार्यक्रम में आमंत्रित करने के लिए किशन सरोज जी से पहली बार फोन पर बात हुई थी। 17 सितंबर 13 की बात है। संक्षिप्त परिचय देने के बाद मैंने उन्हें कार्यक्रम में आने का न्यौता दिया। उन्होंने आभार के साथ उसे स्वीकार किया। लेकिन अस्वस्थ होने की वजह से आने में असमर्थता जताई। फोन पर बातचीत जारी रही। लेकिन उनसे रूबरू होने का मौका काफी दिन बाद मिला। उनसे पहली मुलाकात भी खासी यादगार रही। अगले वर्ष 2014 में मई की बात है। दिमाग पर जोर डालूं तो शायद तारीख भी याद आ जाए। मैंने किशन जी को फोन किया। उनसे मिलने के लिए घर आने की इच्छा जताई। उन्होंने पता बताया और हार्टमैन कालेज के पास आकर फोन करने को कहा। वहां पहुंच गलियों में भटकने की जानकारी मैंने उन्हें फोन पर दी। उन्होंने मुझे रामलीला मैदान के पास खड़े होने को कहा और खुद तपती दुपहरी में मुझे लेने वहां तक पहुंच गए। घर पहुंच कर साहित्य, समाज, सरकार और सरोकार तमाम विषयों पर काफी देर चर्चा हुई। अगले दिन चार कालम में उनका इंटरव्यू प्रकाशित हुआ। अखबार में स्थान सीमित होने के कारण उसे निर्धारित शब्दसीमा में बांधना पड़ा। हालांकि कवि को शब्दों में बांधना सामर्थ्य से बाहर था। 12 नबंबर 17 को उनके आवास पर हुई एक मुलाकात और भी मुझे याद है। अपने घर पर बिखरी हुई किताबों और सामान के बीच बैठे किशन जी पर बीमारी ने काफी असर डाला था। शिथिल होने और भूलने की वजह से दिमाग पर जोर डालने के बाद भी वह कई बातें चाह कर भी नहीं बता पाए। उन्होंने असमर्थता जताई। हालांकि कई पुस्तकें दिखाईं। किसी तरह उनका संस्मरण प्रकाशित हुआ।

दाह छिपाने को अब हर पल गाना होगा
हँसने वालों में रहकर मुस्काना होगा
घूँघट की ओट किसे होगा सन्देह कभी
रतनारे नयनों में एक सपन डूब गया!
वह देखो! कुहरे में चन्दन-वन डूब गया।

19 जनवरी 1939 को शहर से लगते गांव बल्लिया में जन्मे किशन सरोज जी से अंतिम मुलाकात पिछले वर्ष 2019 को 18 अगस्त को हुई। रोटरी भवन में अक्षरा फाउंडेशन की ओर से सम्मान समारोह था। जिसमें किशन सरोज जी को अक्षरा सम्मान दिया गया। बुजुर्गवार कवि को सहारा देकर मंच तक लाया गया। राज्यमंत्री संतोष गंगवार सहित मंचाशीन मेजबानों ने आगे आकर उन्हें दुशाला ओढ़ाया और स्मृति चिह्न प्रदान किया। श्रृंगार के महाकवि को आगे पहली कुर्सी पर बैठाया गया। अक्षरा फाउंडेशन से जुड़े आलोक यादव, शरद मिश्रा,अवनीश यादव और सिया सचदेवा ने उनके बारे में श्रोताओं को जानकारी दी। शीघ्र स्वास्थ की कामना की। समारोह में किसी को भी न पहचान पाने से किशन सरोज जी खामोश बैठे रहे। हालांकि सभी के अभिवादन का उन्होंने मुस्कुराकर जवाब दिया। हालांकि अपने करीबियों को भी पहचान न पाने पर ‘चंदन वन डूब गया’ का कवि खुद ही असहाय दिखा। अपने 82वें जन्मदिन से 11 दिन पहले प्रेमगीतों के चितेरे ने आठ जनवरी को अंतिम सांस ली। स्मृति शेष किशन सरोज जी को श्रद्धांजलि…

यह कुहासे का कफ़न
यह जागता-सोता अँधेरा
प्राण-तरू पर स्वप्न के
अभिशप्त विहगों का बसेरा
यों न देखो प्रिय! इधर तुम,
एक ज्यों तसवीर गुमसुम,
अनवरत, अन्धी प्रतीक्षा के नियम की बात छोड़ो!
मिल सको तो अब मिलो, अगले जनम की बात छोड़ो!’

काव्य संग्रह मैं तुम्हें गाता रहूंगा का विमोचन
किशन सरोज जी के अंतिम काव्य संग्रह मैं तुम्हें गाता रहूंगा का विमोचन 28 अक्टूबर 2018 में हुआ। इस दौरान बरेली के साहित्यप्रेमियों के साथ तत्कालीन डीएम वीरेंद्र कुमार भी मौजूद रहे। वीरेंद्र कुमार इसके बाद भी किशन सरोज जी का हालचाल पूछते रहे। उन्होंने हर संभव सरकारी सहायता का भी भरोसा दिलाया। वह कई बार किशन जी के घर भी पहुंचे। पिछले वर्ष संजय कम्यूनिटी हाल में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए भी वीरेंद्र कुमार ने उन्हें आमंत्रित किया। उनकी सरपरस्ती में कार्यक्रमों के संचालन का निर्देश दिया था।

भ्रान्त मन, भीगे नयन
बिखरे सुमन, यह सान्ध्य-बेला
शून्य में होता विलय
यह वन्दना का स्वर अकेला
फूल से यह गन्ध, देखो!
कह चली, `सम्बंध, देखो!
टूटकर जुड़ते नहीं फिर, मोह-भ्रम की बात छोड़ो!’
मिल सको तो अब मिलो, अगले जनम की बात छोड़ो!’

प्रेमगीतों ने दी किशन सरोज को पहचान
किशन सरोज जी ने 400 से ज्यादा प्रेमगीत लिखे। 1986 में प्रकाशित उनका पहला गीत संग्रह ‘चंदन वन डूब गया’ खासा सराहा गया। दूसरे संग्रह के प्रकाशन में हालांकि काफी लंबा अंतराल रहा लेकिन, 2006 में ‘बना न चित्र हवाओं का’ के गीत-गजल संग्रह को पाठकों और साहित्यप्रेमियों ने उत्सुकता से हाथों हाथ लिया। उनके लिखे गीत कादंबिनी, धर्मयुग, नया ज्ञानोदय, सरिता, नवनीत, गगनांचल, आदर्श, सार्थक, काव्या, पुनर्नवा आदि पत्र-पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होते रहे। पद्मश्री गोपालदास नीरज और डा.शेरजंग गर्ग द्वारा संपादित काव्य संग्रहों में भी किशन सरोज जी को प्रमुखता से स्थान मिला। 2004 में उन्हें उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान में साहित्य भूषण के सम्मान से पुरस्कृत किया। इसके अलावा भी असंख्य संस्थाओं ने उन्हें समय-समय पर सम्मानित किया। इंडियन एसोसिएशन द्वारा 1993 में यूरोप में प्र्थम अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन में भी किशन सरोज जी ने सहभागिता की। 21 दिवसीय आयोजन के दौरान उन्होंने मैनचेस्टर और लंदन सहित कई शहरों में कवितापाठ किया।

ओ लेखनी विश्राम कर अब और यात्रायें नहीं
मंगल कलश पर काव्य के अब शब्द के स्वस्तिक न रच
अक्षम समीक्षायें परख सकतीं न कवि का झूठ सच
लिख मत गुलाबी पंक्तियाँ गिन छ्न्द, मात्रायें नहीं
बन्दी अधेंरे कक्ष में अनुभूति की शिल्पा छुअन
वादों विवादों में घिरा साहित्य का शिक्षा सदन
अनगिन प्रवक्ता हैं यहाँ बस छात्र छात्रायें नहीं

राजीव गांधी को समर्पित की श्रद्धांजलि
स्वर्गीय पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को पसंद करने वाले किशन सरोज जी उनके संबंध में काफी बातें करते थे। मुलाकातों में उन्होंने राजीव को बेहद सौम्य राजनेता बताया। राजीव का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि हादसे में मृत्यु से एक दिन पहले पूर्व प्रधानमंत्री ने बरेली में जनसभा को संबोधित किया था। वह भी अपने चहेते नेता को सुनने गए थे। दूर से ही राजीव को देखने का मौका मिला लेकिन वह यादगार बन गया। हालांकि इस स्मृति को अगले ही दिन राजीव गांधी की हादसे में मृत्यु ने झकझोर दिया। किशन सरोज भी इससे गमीगन हुए। उन्होंने राजीव को समर्पित कर एक कविता भी लिखी।

अब तुम नहीं तो लग रहा
इस शून्य को भरना कठिन
सच है कि इस लोकतंत्र में
जीना कठिन, मरना कठिन
अब मौन है हर वर्जना
नत मुख खड़ी आलोचना
निश्छल सहज मुस्कान को
यह देश भूलेगा नहीं

साहित्यप्रेमी स्तब्ध
किशन सरोज नहीं रहे। यह साहित्यिक जगत के साथ मेरे लिए व्यक्तिगत क्षति है। हमारे बीच आकाशवाणी का प्लेटफार्म कामन रहा है। मैं उनसे बहुत बहुत जूनियर था, पर कितनी ही बार हमारी रिकार्डिंग एक साथ हुई। आकाशवाणी के लिए कवि सम्मेलन में कई बार मुझे संचालन की जिम्मेदारी मिली और सरोज जी का सानिध्य भी। उनसे जुड़ी कई स्मृतियां जीवंत हैं। आकाशवाणी दिल्ली ने उनके एक गीत को दो साल तक हर गुरुवार लगातार प्रसारित किया था।
-डा.राहुल अवस्थी, कवि

हर घड़ी, हर एक पल है,
पीर दामनगीर कोई
शीश उठते ही खनकती
पाँव में जंज़ीर कोई
आज स्वर की शक्ति बन्दी,
साध की अभिव्यक्ति बन्दी,
थक गये मन-प्राण तक, मेरे अहम की बात छोड़ो!
मिल सको तो अब मिलो, अगले जनम की बात छोड़ो!’

किशन दादा से मेरा व्यक्तिगत परिचय बरेली में पोस्टिंग के दौरान 2014 में हुआ। इसके बाद कई बार उनके घर जाने का सौभाग्य मिला। कई कार्यक्रमों में भी उनका सानिध्य मिला। पिछले साल अगस्त में उन्हें अक्षरा फाउंडेशन ने सम्मानित किया था। तब भी मुलाकात हुई थी। दो वर्ष से याददाश्त चले जाने और अस्वस्थ होने से उनकी स्थिति खराब थी। उनसे जुड़ी बहुत सारी स्मृतियां हैं, लेकिन आज उनके बिछुड़ने से मन बहुत व्यथित है।
-आलोक यादव, कमिश्नर ईपीएफओ

लो विसर्जन आज वासंती छुअन का
साथ बीने सीप-शंखों का विसर्जन
गुँथ न पाए कनुप्रिया के कुंतलों में
उन अभागे मोर पंखों का विसर्जन
उस कथा का जो न हो पाई प्रकाशित
मर चुका है एक-एक चरित्र, तुम निश्चिंत रहना
कर दिए लो आज गंगा में प्रवाहित
सब तुम्हारे पत्र, सारे चित्र, तुम निश्चिन्त रहना


21 अगस्त 1983 में मुरादाबाद स्थित महेश्वर तिवारी के आवास पर बाबा नागार्जुन के साथ कवि किशन सरोज और महेश्वर तिवारी व अन्य लोग।


18 अगस्त को रोटरी भवन में अक्षरा फाउंडेशन के जश्ने अक्षरा कार्यक्रम में कवि किशन सरोज को सम्मानित किया गया।


अपने आवास पर स्वास्थ्य संबंधी जानकारी लेने पहुंचे तत्कालीन डीएम वीरेंद्र कुमार के साथ किशन सरोज व अन्य।

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