आज कोई नहीं जो समाज और देश के बारे में सोचे, दिशा दे

अभी खास

एसआरएमएस ट्रस्ट के चेयरमैन देवमूर्ति ने कहा, संघर्ष के दौर को हमने गले लगा कर जीता
1990 में स्थापित एसआरएमएस ट्रस्ट के तीस वर्ष पूरे होने पर नये संकल्प और मुकाम का भरोसा
विश्वविद्यालय के रूप में एसआरएमएस को विश्व में अलग पहचान दिलाने का लिया संकल्प
समाजसेवा के साथ ही लोगों को रोजगार दिलाने और प्रतिभाओं को मंच देने में मिलता है संतोष
नुक्कड़ संवाददाता, बरेलीः स्वतंत्रता सेनानी और गांधीवादी नेता स्वर्गीय राम मूर्ति जी के नाम को चिरस्थायी रखने के संकल्प में बना एसआरएमएस ट्रस्ट पिता-पुत्र के स्नेह की अद्वितीय मिसाल है। लोगों की आलोचनाओं, रिश्तेदारों के तानों और पूंजी की कमी जैसे अवरोधों को पार कर हजारों लोगों के घरों को सींच रहा यह सपना आज किसी परिचय का मोहताज भी नहीं। जल्द ही निजी विश्वविद्यालय के नए कलेवर में आने को तैयार एसआरएमएस ट्रस्ट के पुष्पित होने की कहानी दरअसल ट्रस्ट के चेयरमैन देव मूर्ति जी के दूरदर्शी होने और संघर्ष की कहानी है। ट्रस्ट के 30 वर्ष पूरे होने पर उन्होंने इन वर्षों के अनुभव को साझा किया। कहा, प्रभु के आशीर्वाद, उसी की सोच और आदेश से कर्तव्य निभा रहा हूं। इतने बड़े संसार में अपने दायित्व को पूरा करने के लिए भगवान ने मेरे जैसे छोटे व्यक्ति को चुना, बड़ी बात है। ऐसे में मुझे भी तन, मन, धन लगाना था। प्रभु को विश्वास दिलाना था कि आपने मुझे जो दायित्व दिया मैं उसे पूरा करूंगा।

सवाल – एसआरएमएस ट्रस्ट बनाने का विचार आपको कैसे आया ?
देव मूर्ति जी – मेरे पिता राम मूर्ति जी अंतिम दिनों में बीमार थे। बरेली में उन्हें ठीक से उपचार नहीं मिल पाया। अंततः दो अक्टूबर 1988 को वह देवलोक प्रस्थान कर गये। काफी दिन मैं सदमें में रहा। किसी काम में मन न लगना स्वाभाविक था। 34 वर्ष उम्र थी मेरी। पिता के नाम और उनके आदर्शों को चिरस्थायी रखने का ख्याल था। उनके नाम से ट्रस्ट बनाने का संकल्प लिया। 1990 में एसआरएमएस ट्रस्ट बना। 1991 में बरेली कालेज में निर्बल आय वर्ग के 11 विद्यार्थियों को 21 हजार रुपये की स्कालरशिप देने के साथ पिता के आदर्शों पर काम शुरू किया। आज 19 तरह की स्कालरशिप एसआरएमएस ट्रस्ट दे रहा है। जिसमें 20 हजार से सवा दो लाख तक की राशि दी जा रही है।

सवाल – एसआरएमएस ट्रस्ट को मूर्त रूप देने में संघर्ष के दौर से कैसे निकले ?
देव मूर्ति जी – संघर्ष (मुस्कुराते हुए)…। लोगों ने तो मजाक उड़ाना शुरू कर दिया था। इंजीनिरिंग कालेज की बात पर परिवार के लोग मुझसे सवाल करने लगे कि देव मूर्ति इंजीनियरिंग कालेज की परिभाषा जानते हो। रिश्तेदार कहने लगे थे कि देव मूर्ति पर विश्वास मत करना। रुपये दिये तो मिलेंगे नहीं। बरेली के कई कथित दानी मठाधीशों के पास गया। लेकिन उनसे भी कोई मदद नहीं मिली। सभी मुंह मोड़ रहे थे। पूंजी का अभाव था। ऐसे में ऊपरवाला (ऊपर दीवार पर लगी भगवान कृष्ण की फोटो की ओर इशारा करते हुए) सहायक बना। साधन बनते गए। धन प्राप्त होता गया। सबसे पहले क्रेशर बेच कर थोड़ी सी पूंजी इकट्ठी की। धनराशि के लिए नई स्कीम शुरू की। आम लोगों से 50 हजार और एक लाख रुपये बैंक में डिपाजिट करने को कहा। बैंक के ब्याज के साथ नौकरी भी देने का वायदा किया। भरोसा दिलाया कि दो साल में नौकरी सरकारी ग्रेड के साथ स्थायी हो जाएगी। धीरे-धीरे लोगों का भरोसा बढ़ता गया। काम शुरू हुआ। शुरूआत में रुपये न मिलने के डर से बिल्डिंग बनाने के लिए ठेकेदार नहीं मिले। क्रेशर की लेबर और मिस्त्री से खुद खड़े होकर काम कराया। पिता जी के आशीर्वाद से लागत से 40 फीसद कम में इंजीनियरिंग कालेज की शानदार इमारत तैयार हुई। तब से आज तक काम जारी है। ऐसा कोई दिन नहीं हुआ जब एसआरएमएस ट्रस्ट के लिए दो से ढाई सौ मजदूर काम न कर रहे हों।

सवाल – पहली बार आपने अपने संकल्प को कब सार्वजनिक किया ?
देव मूर्ति जी – बाबू जी (राम मूर्ति जी) के जाने के बाद 1989 में शहर विधानसभा का चुनाव लड़ा। पहली सभा कोहाड़ापीर में की। वहां मैंने पहली बार बरेली में मेडिकल और इंजीनियरिंग कालेज की स्थापना का वायदा किया। तब सरकारी संस्थानों में ही यह शिक्षा मिलती थी। ऐसे में यह घोषणा बहुत बड़ी बात थी। तीन साल बाद 1992 में बरेली कालेज सभागार में बाबू जी की स्मृति में हुए कार्यक्रम के दौरान मैंने फिर इंजीनियरिंग और मेडिकल कालेज की स्थापना की घोषणा दोहराई। लोगों ने मजाक में कहना शुरू किया कि देव मूर्ति अब नेता बन गया है। लेकिन मैं अपने संकल्प पर लगा रहा। आज एसआरएमएस ट्रस्ट युवाओं को शिक्षा दिलाने के साथ ही समाजसेवा के तमाम काम कर रहा है। किसी भी मरीज को धन के अभाव में मरने न देना और बेहद कम कीमत पर सर्वश्रेष्ठ स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराना हमारा संकल्प है। ट्रस्ट की ओर से प्रति वर्ष 2.25 लाख रोगियों को 1.5 करोड़ रुपये से ज्यादा की दवाइयां निशुल्क दी जाती हैं।

सवाल – ट्रस्ट का पहला संस्थान कैसे और कब शुरू हुआ ?
देव मूर्ति जी – प्रदेश के पहले सेल्फ फाइनेंस इंजीनियरिंग कालेज को खोलने का श्रेय एसआरएमएस को मिला। दिसंबर 1994 में इसकी अनुमति मिली। लेकिन अपना कैंपस न होने से हमने एक वर्ष बाद 1995 में प्रवेश आरंभ किया। पहले सत्र में इंजीनियरिंग की दो ब्रांचों में 240 बच्चों ने एडमीशन लिया। आज इंजीनियरिंग कालेज में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या तीन हजार से ज्यादा है। यह और ज्यादा होती लेकिन, हमने क्वालिटी से कोई कंप्रोमाइज नहीं किया। सीटें नहीं बढ़ाईं। हमारा मकसद रहा कि जो विद्यार्थी यहां पढ़े वह पूर्ण ज्ञान ले जाएं। इसी बदौलत करीब 21-22 बैच निकल गए। ज्यादातर को बेहतर प्लेसमेंट मिला। कोई 19 लाख का सालाना पैकेज लेकर यहां से निकला तो कोई पांच से 12 लाख। सभी का अपनी काबिलियत के अनुसार प्लेसमेंट हो रहा है।

सवाल – क्या इंजीनियरिंग कालेज शुरू होने के बाद लोगों की सोच कुछ बदली ?
देव मूर्ति जी – किसी को आगे बढ़ते कौन देखना चाहता है। इंजीनियरिंग कालेज की अनुमति के बाद भी लोग रोड़े लगाते रहे। एफिलिएशन न मिले, इसकी चालें चलती रहीं। फिर भी एफिलिएशन मिला। सत्र आरंभ हुआ। एडमीशन शुरू हुआ। बच्चे पढ़ने लगे। तो फिर कालेज में तोड़फोड़ कराई गई। राजनीति शुरू हुई। आज भी लोग इसमें लगे हैं। अब पीठ पीछे ऐसा हो रहा है।

सवाल – समाजसेवा के लिए लोग राजनीति चुनने हैं फिर आपने राजनीति छोड़ सिर्फ समाजसेवा क्यों चुनी ?
देव मूर्ति जी – दो घोड़ों पर जो भी चढ़ेगा। गिर जाएगा। शुरू में मैं भी दोनों क्षेत्रों को साथ लेकर चला। मैं किसी एक के साथ भी न्याय नहीं कर पा रहा। राजनीति दलदल की तरह लगने लगी। लगा अगर फंस गए तो निकलना संभव नहीं होगा। ऐसे में शिक्षा क्षेत्र में लोगों को ज्ञान देने, रोजगार देना ज्यादा जरूरी लगा। ऐसा कर डाक्टर, वैज्ञानिक देकर समाज को ज्यादा विकसित करने की उम्मीद दिखी। प्रभु की दी हुई सोच को आदेश समझा, राजनीति से ज्यादा समाजसेवा को महत्व दिया। आज भी अपने फैसले पर कायम हूं।

सवाल – राजनीति में अनफिट मानना तो कहीं इसे छोड़ने की वजह नहीं ?
देव मूर्ति जी – ऐसा कुछ नहीं है (मुस्कुराते हुए)। राजनीति मेरे खून में है। क्रिश्चियन कालेज में दसवीं कक्षा से ही मैं राजनीति में सक्रिय था। लखनऊ विश्वविद्यालय छात्र संघ में सेक्रेटरी बना। एनएसयूआई की राजनीति की। बरेली में रिक्शा चालक यूनियन का संरक्षक रहा। पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी की कोर टीम थी। 11 लोगों की। उसमें भी सबसे युवा सदस्य रहा हूं। पूरी राजनीति जानता हूं। आज के जमाने की भी। दूसरों को ट्रेंड करने के साथ आज भी राजनीति कर सकता हूं। (हंसते हुए) चुनाव लड़ना भी जानता हूं। मेरे पिता जी आजादी से पहले 1946 के चुनाव में एमएलए बने थे। अंतिम सांस तक वह राजनीति में रहे। वह गांधीवादी विचारधारा के थे। जब मैं उनके साथ राजनीति में आया तब तक गांधीवाद समाप्त हो चुका था। मैंने हमेशा मुद्दों पर राजनीति की। आज भी जिले का या प्रदेश का ऐसा कोई राजनीतिज्ञ नहीं जो मुझे जानता न हो। सम्मान न देता हो। उम्र में भी बड़ा हो गया हूं। हर दल के लोग अब मुझसे आशीर्वाद लेते हैं। सभी को सही सलाह देता हूं। राजनीति में आकर्षण है। इसे छोड़ने की वजह समाजसेवा को ज्यादा जरूरी समझना है।

सवाल – किस राजनीतिक विचारधारा की ओर झुकाव है आपका ?
देव मूर्ति जी – सभी दलों में मेरे चाहने वाले हैं। लेकिन मेरा झुकाव, रुझान कांग्रेस की ओर है (मुस्कुराते हुए)। हालांकि आज कांग्रेस अपनी विचारधारा से हट गई है। समय बड़ा परिवर्तन लाता है। आज सिर्फ कांग्रेस नहीं, सभी दलों की विचारधारा बदल रही है। देश को कैसे आगे ले जाने की सोच ही खत्म हो गई। युवा पीढ़ी लगी है। विश्वास है थोड़े दिनों में सब ठीक हो जाएगा। व्यक्तिगत विचारधारा से पार्टी की विचारधारा हमेशा से बड़ी रही है। विश्वास है कि कांग्रेस भी व्यक्तिगत प्रभाव से निकलेगी। पार्टी की विचारधारा को तवज्जो मिलेगी।

सवाल – ट्रस्ट की स्थापना के 30 वर्ष हो गए। आपका कुछ नया संकल्प ?
देव मूर्ति जी – वर्ष 2020 शुरू हो गया है। प्रदेश सरकार ने एसआरएमएस ट्रस्ट के विश्वविद्यालय के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है। हमें परमीशन मिल गई है। अब ट्रस्ट नयी दिशा में चल कर विश्व में अपना स्थान बनाने का प्रयास करेगी। हमारी कोशिश होगी कि जिस तरह हमारे देश के युवा विदेश जाकर पढ़ते हैं। रिसर्च करते हैं। वैसा की कुछ यहां हो। ऐसे कोर्स और संसाधन लाए जाएं कि दूसरे मुल्कों के युवा एसआरएमएस विश्वविद्यालय में आकर पढ़ें। दुनिया में बरेली को एसआरएमएस विश्वविद्यालय के नाम से जाना जाए। आदिकाल से बाहर के लोग साहित्य पढ़ने, जीवन को समझने भारत आते रहे हैं। हम भी उन्हें यह अवसर देंगे। मेडिकल, इंजीनियरिंग, कानून और पैरामेडिकल में रिसर्च करने विदेशी युवा यहां आएंगे। जिन्हें हम बाबू जी के विचार, उनके आदर्श, देश की संस्कृति से परिचित कराने का काम करेंगे।

सवाल – बाबू जी को छोड़ कर कोई अन्य रोल माडल है आपका ?
देव मूर्ति जी – मैं बेइमानी की बात नहीं कहूंगा। आज कोई भी ऐसा राजनीतिज्ञ नहीं जो अपना अलग स्थान बनाए हुए हो। जो खुद के बजाय देश के लिए सोच रहा हो। आज आप सर्चलाइट लेकर भी निकलें लेकिन, शायद ही ऐसा कोई आदर्श व्यक्ति आपको मिले। कोई बिरादरी की राजनीति कर रहा है तो कोई जाति की, धर्म की राजनीति कर रहा है। देश की राजनीति कोई नहीं कर रहा। समाज और देश को एक नेक विचारधारा दे। एक सोच दे। जाति, धर्म के दलदल से उठ कर भारत को नयी दिशा दे। राष्ट्रीय विचारधारा देकर युवाओं को मजबूत करे। ऐसा कोई नहीं दिख रहा। लेकिन मैं निराश नहीं हूं। एक दिन ऐसा होगा। कोई नौजवान ऐसा करेगा। जिसके पीछे पूरा हिंदोस्तान चलेगा। यह सपना नहीं होगा। विश्वास है भविष्य में ऐसा कोई व्यक्ति जरूर आएगा।

सवाल – आप अनुशासन प्रिय हैं, आज युवाओं में संस्कार कम हो रहे हैं, क्या करेंगे ?
देव मूर्ति जी – नई पीढ़ी को संस्कार कौन सिखाएगा। मां- बाप, गुरु, स्कूल, समाज। आज परिवार एक कमरे, एक मोबाइल में सिमट कर रह गया। न बच्चों को बड़ों की चिंता है और न बड़ों को बच्चों की। आप कहीं भी किसी भी घर जाइये। आपको सभी अपने मोबाइल में लगे मिलेंगे। तो संस्कार कहां से आएंगे। फैमिली न्यूक्लियर होती जा रही हैं। दादी- नानी भूल गए बच्चे। आज दादी घर आ जाए तो भार लगता है। आजादी में खलल पड़ जाता है। बड़े बुजुर्ग कुछ कह दें तो लगता है कि गोली मार दी उन्होंने। संस्कार को हमने आपने सबने खत्म कर दिया। जिन परिवारों में आज भी बड़े बूढ़े हैं। संस्कार हैं। भारतीय संस्कृति और विचार न खत्म हुआ है और न ही होगा। कुछ हमारे जैसे लोग हैं जो हमेशा यह मशाल लेकर दौड़ेंगे। उन्हें देख कर दूसरे भी आगे आएंगे। मशाल अगली पीढ़ी के लिए आगे ले जाएंगे। एसआरएमएस में हर व्यक्ति को हर बच्चे को संस्कार दिया जाता है। भारतीय संस्कृति का ज्ञान कराया जाता है। रिश्ते क्या हैं बताया जाता है। एसआरएमएस छह हजार से ज्यादा लोगों का परिवार है। 24 हजार से ज्यादा लोग सीधे तौर पर जुड़े हैं। अपरोक्ष रूप से भी हजारों लोग जुड़े हैं। हम संस्कारों को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं।

सवाल – युवाओं और समाजसेवा के इच्छुक लोगों को क्या संदेश देंगे ?
देव मूर्ति जी – युवाओं के लिए जरूरी है कि वह समय को समय समझें। समय की गति इंसान से दस गुना तेज है। यदि समय को पकड़ना है तो संयम के साथ अपने विचारों पर चलना पड़ेगा। युवा पीढ़ी विचार जरूर बनाए, आलस छोड़े। अपने काम पर पूरा ध्यान दे। पिता जी को आल टाइम मनी समझने और उनके पैसे पर ऐश करने के बजाय खुद आगे बढ़े। खुद के भरोसे अपने सपने पूरे करें। सफलता जरूर मिलेगी। दूसरे के कंधे पर या सत्ता के बल पर समाजसेवा नहीं की जा सकती। मैंने भी खुद के भरोसे ही समाजसेवा शुरू की। 21 हजार रुपये से शुरू की स्कालरशिप आज 3.5 करोड़ पहुंच गई है। इसके लिए किसी से चंदा नहीं मांगा गया। जो भी कर रहा हूं वह अपनी आय से ही। खुद से ही शुरू करें समाजसेवा। तभी लोग आपका सम्मान करेंगे। सत्ता तो आनी-जानी है।

—-

Please follow and like us:
0

Leave a Reply